बापू ! तुम्हारी ऐनक !
- रवींद्र कात्यायन
बापू ! तुम्हारी ऐनक !
बहुत पहले ही चढ़ गई थी शायद
तुम्हारी आँखों पर
इतिहास के काल की
जटिल सँभावनाओं के बहुत पहले
तुम बन गए थे इसका अटूट हिस्सा...
बापू ! तुम्हारी ऐनक !
जिसके गोल शीशे तुम्हारी एक निश्चित पहचान बनाते हैं
कई देशों की राजनीति से तुम्हारा परिचय
इन्हें पार करके ही हुआ था
जिन पर कभी धुंध नहीं जमी...
बापू ! तुम्हारी ऐनक !
तुम्हें देखना सिखाया दुनिया
ग़रीब जनता का दर्द
असहाय गुलामी की पीड़ा
अन्यायी का शोषण
और प्रतिकार करने की तुम्हारी शैली
इसी ने विकसित की...
बापू ! तुम्हारी ऐनक !
जिसके वृत्ताकार फ़्रेम से झाँकती
तुम्हारी दयालु आँखें
बहुतों के लिए मार्ग निर्देशिका बनीं
उस फ़्रेम का रंग सुनहरा था
अथवा रुपहला, काला या सफ़ेद
बेमानी है अब रंग के बारे में सोचना
कि काल का रंग उस पर सबसे गहरा है
जिसने बना दिया तुम्हें एक मिथकीय पात्र...
बापू ! तुम्हारी ऐनक !
टूटी, कई बार उसकी कमानी
पर उसने नहीं टूटने दिया तुमको
खुद धागे के सहारे लिपटती रही कान पर
पढ़ाती रही तुम्हें अहिंसा का पाठ
देती रही सीख
बिना टूटे...बिखरे
तनाव में शक्ति अर्जित करते हुए...
बापू ! तुम्हारी ऐनक !
जिसके पारदर्शी शीशे से
तुम्हारे अंदर प्रविष्ट होता समय
तुम्हारी उम्र तय करता
आंदोलन, विरोध, प्रतिकार, जागरण की शक्ल में
अपनी उम्र बढ़ाता रहा
तुम्हें पीछे छोड़ते हुए
कालजयी बन गई तुम्हारी रंग भेद की नीति
आगे देखती रही हमेशा, काल से परे...
बापू ! तुम्हारी ऐनक !
कई क्रूर कालखंडों ने घिस दिया है
आज उसके शीशों को
जिस पर तमाम कटी-पिटी रेखाओं के
न मिटने वाले निशानों ने
ले ली है धूप की किरणों में
इंद्रधनुषों की शक्ल
साठ वर्षों में ही
म्यूज़ियम के किसी सन्नाटे कोने में
धूल खाती बेजान पड़ी है
काल को कँपा देने वाली...
बापू ! तुम्हारी ऐनक !
समय बहुत बदल गया है बापू !
तुम्हारी घड़ी, छड़ी और ऐनक
दरअसल, अब फ़ैशन से बाहर हो चुके हैं
तुम्हारी जन्मभूमि, तुम्हारा गुजरात
अब बाज़ार बन गया है
और बाज़ार, गुजरात !
ऐसे समय में तुम्हारी ऐनक
सिर्फ़ एक 'एंटीक पीस' है
जिसके चहेते बहुत कम लोग बचे हैं...

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