फ़ौजी व्यवस्था और स्त्री
रवींद्र कात्यायन
यदि हम सेना में नौकरी करने वाले सैनिकों या जवानों का स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण जानना चाहें, तो पहले हमें यह जानना होगा कि फौजियों का स्त्रियों के साथ उठना बैठना कितना होता है ? फौजियों का सामना मुख्यत: निम्न प्रकार की स्त्रियों से होता है -
क) वे स्त्रियां, जो फौज में अधिकारी के रूप में नौकरी कर रही हैं। फौज की सभी शाखाओं में आज महिलाएं उत्कृष्ट कार्य कर रही हैं।
ख) वे स्त्रियां, जो फौजियों की पत्नी, बेटी या मां हैं।
ग) वे स्त्रियां, जो किसी अन्य तरह की नौकरी में फौज की सीमा में रहकर कार्य कर रही हैं, जैसे नर्स, क्ल सी.एस.डी. कैंटीन क्ल, अध्यापिका, बैंक लिपिक, कैशियर, टेलीफोन ऑपरेटर आदि।
घ) वे स्त्रियां, जो अनियमित रूप में फौज में छोटे-मोटे काम पर रख ली जाती हैं, जैसे दैनिक आधार पर घास काटने वाली, सफाई करने वाली, चपरासी के रूप में, अस्पताल की आया के रूप में या फौजियों के घर में घरेलू काम काज करने वाली आदि।
ङ) वे स्त्रियां, जिनका फौज से किसी तरह का संबंध नहीं है, पर फौजियों की हर यूनिट के आस पास रोजमर्रा की खरीद फरोख्त मेंउनका सामना प्रतिदिन फौजियों से होता है।
च) वे स्त्रियां, जो सिविल में हैं और जिनका फौज से किसी तरह का संबंध नहीं है।
फौज की नौकरी कम उम्र में ही शुरू हो जाती है- सोलह, साढ़े-सोलह या सत्रह से। कहा जाता है कि गधे को घोड़ा बनाना आसान है, पर घोड़े को घोड़ा बनाना मुश्किल। इसीलिए कम उम्र में ही फौज में भर्ती हो जाती है कि तब तक वे गधे ही हों, घोड़े न बने हों। इस नाजुक उम्र में उन्हें प्रेम की, सहानुभूति की आवश्यकता होती है, और उन्हें मिलती हैं गालियां, शराब और ढेर सारे प्रतिबंध। जो उम्र सारे बंधनों को तोड़ देने की क्षमता और जज्बा रखती है, उसे अनुशासन और प्रतिबंधों के पाश में जकड़ दिया जाता है। और इस पर तुर्रा यह कि फौजी को अभिव्यक्ति का कोई अधिकार नहीं दिया गया है, अन्यथा फौज में अहर्निश चलने वाले भ्रष्टाचार, दुराचार की मात्रा कुछ कम होती। फौजी को सोचने नहीं दिया जाता है। उसको न तो सोचने की आज्ञा है, न इसके लिए समय और न ही इसकी छूट। यदि उसके पास कोई काम नहीं है तो उसे बोतल थमा दी जाती है। कोई फौजी अधिक संवेदनशील है, अच्छे घर से आया है, या जरूरत से अधिक पढ़ा-लिखा है, और बोतल नहीं अपना पाता है तो उसके लिए टी.वी, वी.सी.आर., फिल्में, अश्लील फिल्में, अश्लील साहित्य आदि उपलब्ध हैं। वैसे सेना में इन अश्लील फिल्मों और अश्लील साहित्य का प्रयोग वर्जित है। यह न मान लिया जाए कि जवान खुले आम इस सबका प्रयोग कर सकते हैं। यह सब चोरी-चुपके होता है - रात के अंधेरे में। यदि बात किसी कारण फ़ैल जाती है या इस दौरान कुछ गड़बड़ हो जाती है, तो जवानों को पकड़ कर रात भर सेल में बंद कर दिया जाता है और सवेरा होने पर थोड़ा-बहुत दंड। लेकिन वह सामग्री सेना-पुलिस के जवानों के काम आती है। यदि किसी अफसर ने वह सामग्री जमा कर ली है तो वह उसके काम में आती है। जवान फिर नए सिरे से नई सामग्री जुटाते हैं- जो सहजता से उपलब्ध है। यदि सेना के किसी अधिकारी से इस बारे में पूछा जाए तो वह यही कहेगा- NOTHING OFFICIAL ABOUT IT.
तो आप कुछ समझे! जी, हां! यह सब अधिकारियों को मालूम रहता है। यहां तक कि कोई अफसर जवान को शराब पीने से नहीं रोकता है। उलटे वे जवानों के मांगने पर अपने कोटे की शराब भी उन्हें दिलवा देते हैं। हां एक और भ्रांति का निवारण करना चाहता हूं - फौज में किसी को भी शराब मुफ्त में नहीं मिलती है। इसके लिए उन्हें अपना पैसा देना पड़ता है। फौजियों के खाने की बात करें तो फौज में सबसे अधिक भ्रष्टाचार उनके खाने में ही होता है। यहां तक कि मुर्गे की टांगों के लिए कोर्ट मार्शल तक हो सकते हैं.......
यह सब विषय से अलग है परंतु अप्रासंगिक कतई नहीं। इसलिए मूल विषय पर आने से पूर्व मुझे इस भूमिका की आवश्यकता पड़ी। तो इस माहौल में नई उम्र के भोले-भाले जवान.....घर बार से बिछड़े हुए.....ऊर्जा से भरपूर.....महीनों की एकरसता भरी जिंदगी.....। ऐसी स्थिति में वह क्या सोचें.....क्या करें- इसका सही-सही मार्गदर्शन उनको कहीं भी नहीं मिलता है। उनके हाथ में तनख्वाह के अच्छे-खासे रुपए बचे होते हैं- घर भेजने के बाद भी। फिर उन्हें खर्च कैसे करें ? इसलिए उनका लगभग सारा खर्च हरियाली के लिए है। जी हां ! यही या ऐेसे ही शब्द प्रयोग करते हैं वे- लड़की या स्त्री के लिए। कठोर प्रशिक्षण.....अनगिनत प्र्रतिबंध..... सिर्फ पुरुषों के बीच महीनों जीवन गुजारना.....फिर गालियां.....कभी-कभी अमानवीय शारीरिक दंड.....बिना किसी मानवीय कारण के.....अन्यथा प्रशिक्षण में रहने वाले सैनिकों का कभी-कभी शारीरिक शोषण.....जी हां ! समलैंगिक शोषण- वह भी डरा-धमकाकर। तो उनके इस मरुस्थल में किसी लड़की या स्त्री का दिख भर जाना उनके लिए हरियाली से कम नहीं है .....एक ठंढी बयार का झोंका। एक फौजी उक्ति है-
''भगाओ मत अगर कमरे में दाखिल हो गई कुतिया,
बड़ी मुश्किल से अपने घर जनाने पैर आए हैं।''
- एक फौजी सूक्ति.
तो, फौजियों के लिए लड़की, नारी या स्त्री का अर्थ है- माल, चीज़, हरियाली, सेक्स या उत्तेजना आदि-आदि.....कम से कम शादी के पहले तक। और जब नींव ही इतनी मजबूत हो तो इमारत का क्या कहना.....उसे तो बुलंद होना ही है। फिर ! एक फौजी के लिए नारीवाद का क्या अर्थ हो सकता है - कहने की जरूरत नहीं।
कमोबेश यही स्थिति फौज में नौकरी करने वाली महिला अफसरों की होती है। उनके सीनियर उन पर हुक्म चलाते हैं- सही और गलत दोनों। महिला अफसरों को पार्टी में न जाने की छूट नहीं है.....उन्हें जाना ही होता है..... शराब पिए हुए साथी अफसरों के साथ डांस भी करना जरूरी है.....पीने की मनाही नहीं है उन्हें..... बल्कि पुरुष तो चाहते ही हैं कि वे अवश्य पियें.....तो फिर प्रतिरोध कैसे कर पाएंगी .....और फिर वही सब.....। जोर जबरदस्ती तो नहीं होती है, पर षड़यंत्रों से तो कोई नहीं रोक सकता.....और छेड़-छाड़ तो मामूली बात है। हां ! अगर कोई स्मार्ट होने के साथ सुंदर भी है तो फिर कमांडर उसे अपनी ही डयूटी पर लगा देता है....फिर किसी और अफसर की क्या मजाल जो उस पर हाथ रख सके.....। अगर किसी अफसर की नई शादी हुई है और वह अपनी पत्नी को लेकर आया है, और यदि वह दुर्भाग्य से सुंदर भी है तो कमांडर भी उस अफसर को किसी जरूरी डयूटी पर किसी यूनिट भेज सकता है - दस पांच दिनों के लिए- वह भी अकेले। यह तो आप को पता ही है कि फौज की किसी डयूटी पर फौजी अकेले ही जाता है- पत्नी को वहीं छोड़कर- अकेला.....लौटकर आ जाएगा तो रस्मों को समझ जाएगा। वह भी तो शादी के पहले अपने सीनियर अफसरों की पत्नियों की कमर में हाथ डालकर नाच चुका होता है। पर एक जरूरी बात.....यह सब सभी के साथ नहीं होता.....और हमेशा नहीं होता..... लेकिन, हवा में सरगोशियां तो होती ही हैं.....
अब बात उन स्त्रियों की जो किसी फौजी की पत्नी, बेटी या मां हैं। बात यहां उनकी ही है जो फौजी कैम्प के अंदर रहती हैं या फिर कैम्प की कालोनी में। फौजियों के लिए- विशेषकर छड़े फौजियों के लिए तो वे कालोनियां मालगोदाम हैं। ट्रेनिंग सेंटर में जवानों को इन कालोनियों में खुले आम आने जाने की छूट नहीं होती है। फिर भी उन्हें कोई रोकता नहीं है। या फिर शापिंग सेंटर आदि में बिहारी का वह.....नटत, खिझत, लजियात....... वाला दोहा चलता रहता है। यह आंखों का खेल खेलने में लड़कियां भी पीछे नहीं रहती हैं। जिन बुङ्ढे फौजियों की जवान बेटियां होती हैं, उनके लिए काफी मुश्किल हो जाती है। अपने पैतृक शहर में यदि वे उनको लेकर ब्याहने जाएंगे, तो नाना प्रकार के मीन मेख......और फिर दहेज की मोटी राशि- जो उनकी छोटी तनख्वाह के लिए संभव नहीं होती है। घर वालों का सहारा कब का खत्म हो चुकता है। तब यही एक सहारा है कि अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी तालीम देकर योग्य बनाया जाए- विशेषकर लड़कियों को । अगर वे इस लायक न निकलीं कि कुछ बन सकें तो कम से कम किसी जवान, स्मार्ट, सुंदर फौजी से शादी करके घर तो बसा ही सकती हैं। हर बड़ी यूनिट में कई फौजियों की शादियां इसी तरह अक्सर होती हैं। कभी-कभी किसी फौजी की पत्नी पर उसका साथी फौजी ही डोरे डाल देता है। अंतत: बात सिर्फ यही है कि यह सब व्यक्तिगत क्षमता और कौशल पर निर्भर करता है ......चाहे इसे आप उस फौजी का कौशल मानें या उस स्त्री का। यही बात अफसरों पर भी लागू होती है। उनको यह छूट है कि वे अपनी स्त्री मित्रों को अपने साथ यूनिट में ला सकते हैं.....चाहे उनको अफसर मेस में रखें या अपने कमरे में। यहां तक कि वे पेशेवर स्त्रियों को भी ले आएं तो भी किसी को कुछ पता नहीं चलेगा.....और अगर पता चल भी गया तो सब मिल बांट लेंगे। खैर.....बेहतर होगा कि आप थोड़े में ही बहुत समझ लें .....तो फिर अगले मुद्दे की ओर।
अब आता है उनका नंबर जो किसी फौजी यूनिट में किसी प्रकार की नौकरी कर रही हैं। केंद्रीय विद्यालय की अध्यापिका या बैंक में क्ल या एकाउंट सेक्शन में कार्य करने वाली महिला अथवा लड़की या सी.एस.डी. कैंटीन में कार्यरत क्ल अथवा कैशियर अन्यथा टेलीफोन आपरेटर। नर्सों के बारे में ऊपर लिखा ही जा चुका है .....उनसे भी कोई-कोई फौजी टांका भिड़ा ही लेते हैं। यूनिट में काम करने वाली इस प्रकार की स्त्रियों को देखना भी एक खेल है। ह्लाुंँआरे फौजी इस तरह की स्त्रियों को प्रतिदिन वहां जाकर एक बार देखना जरूर चाहते हैं। यह उनके लिए आई टानिक है.....हर फौजी की पसंद-नापसंद भी अलग होती है। कुछ फौजी इस सबसे दूर भी रहते हैं, पर ऐसों की संख्या बहुत कम होती है। कभी - कभी इस अभ्यास के सुंदर परिणाम भी आ जाते हैं......किसी फौजी की शादी के रूप में। हां ! फौजी बलात्कार या जोर जबरदस्ती में अधिक विश्वास नहीं करते .....बात बनी तो बनी नहीं तो कहीं और। न हुआ तो कोठे पर जाने से कौन रोक सकता है। यह बात गौरतलब है कि हर फौजी यूनिट में उस क्षेत्र के प्रतिबंधित स्थानों (Out of Bound Areas) की सूची लगी होती है। तो अपने आप उन्हें उन सब स्थानों की जानकारी मिल जाती है। अब यह तो सबको मालूम है कि जहां पर रोक होती है, वहां जाने में कुछ अलग ही सुख है।
लगभग हर फौजी यूनिट में कुछ इस प्रकार की स्त्रियां भी आती हैं, जिनका काम मजदूरी करना, घास काटना, या इसी प्रकार के अन्य काम करना होता है। या फिर कोई घर के छोटे-मोटे काम करने वाली होती है। इन सबसे फौजियों का व्यवहार अच्छा नहीं होता.....कम से कम फौजी पुलिस वालों का। क्योंकि वे उनको कैम्प के भीतर जाने का पास वगैरह बनाते हैं, तो उनसे इसका टैक्स भी वसूलते हैं। यह टैक्स तो अब आप जानो कि किसी भी रूप में हो सकता है। फिर वही देने और लेने की क्षमता और कौशल। न कुछ हुआ तो थोड़ी-बहुत छेड़-खानी से तो कहीं नहीं गए। कभी-कभी कोई अधिकारी भी इन पर टैक्स लगा देता है। जैसे एक फौजी के घर में दूध देने का एक रुपया रोज़। बीस घरों में वह दूध देती है तो बीस रुपए रोज़ उस अधिकारी को पहुंचाना जरूरी है। घास काटने वालियों का तो और भी बुरा हाल होता है। कैम्प के भीतर तो उनको कोई भी फौजी हड़का सकता है। यदि वह पानी पीना चाहती हैं, तो पानी के बदले भी उनसे कुछ-कुछ वसूला जा सकता है। न हुआ कोई फौजी तो कोई कुक, चपरासी या अर्दली भी उनका शोषण कर सकता है।
अब उनका कुछ जिक्र हो जाए जो हर फौजी यूनिट के बाहर रोज़मर्रा के सामानों की दुकानों पर बैठती हैं।वे उस दुकान की मालकिन भी हो सकती हैं या नौकर भी। या अपने पति, पिता, भाई अथवा बेटे की दुकान पर बैठकर सामान बेचना उनका काम होता है। पर इसका मुख्य कारण यही है कि बन-ठनकर बैठने से अधिक फौजी उनसे सामान लेने आएंगे। इन दुकानों की बिक्री उस पर बैठने वाली स्त्रियों की सुंदरता और आंगिक, वाचिक तथा आहार्य अभिनय के अनुरूप तय होती है। कोई तो मासिक एकाउंट भी चला देती हैं क्योंकि परिवार वाले फौजियों के पास हर वक्त पैसा नहीं होता.....और उनका पैसा लेकर कोई भागता नहीं है। इन नारियों से भी फौजियों के मधुर संबंध होते हैं। उनसे हंसी-मजाक भी चलता है। पर उनके पति, पिता या बेटे इस हंसी मजाक को एक सीमा तक ही सहते हैं। यदि कोई जवान किसी को खुले आम छेड़ दे तो उसकी पिटाई भी हो सकती है। नहीं तो इससे अधिक कड़ा भय यह होता है कि उसकी शिकायत उसके कमांडर से कर दी जाएगी। यहां पर उनके संबंध ग्राहक और विक्रेता के होते हैं। लेकिन आपसी सहमति से सब कुछ हो सकता है। यदि किसी फौजी यूनिट के बाहर कोई सुंदर लड़की कपड़े प्रेस करती है तो हिम्मत वाले फौजी वहीं अपनी शर्ट उतारकर उससे खड़े-खड़े प्रेस करवाते हैं। अब जब तक वह शर्ट प्रेस करती है, वह फौजी वहीं खड़ा रहता है- सिर्फ पैंट पहने- शर्ट प्रेस करवाने के दिन वह बनियान तक पहन कर नहीं आता। ऐसे में वह प्रेस करने वाली उस फौजी को पसंद कर ले और उनमें कुछ-कुछ हो जाए तो उनकी शादी भी हो सकती है। फौज में ऐसी कई शादियां हुई हैं।
अंत में उन स्त्रियों का जिक्र आता है जो कहीं भी किसी तरह फौजियों से जुड़ी नहीं होती हैं। यह पूर्णत: सिविलियन हैं। इन पर किसी फौजी का कोई दबाव या जोर या स्वार्थ नहीं होता है। फौजी भी यह बात अच्छी तरह समझते हैं। वह बात अलग है कि अपनी उद्दंडता या बदतमीजी से वे उनसे पेश आएं अथवा सभ्य मनुष्य के रूप में। सिविल में फौजी की बहुत इज्जत होती है.....पर तभी तक, जब तक वह अपनी इज्जत दांव पर नहीं लगाता। जैसे ही वह अपनी औकात भूलता है, लोग भी उसका लिहाज करना भूल जाते हैं। वैसे भी फौजी समाज में मिसफिट होते हैं। अधिकतर दुनियादारी से दूर और परिवार से छूटे हुए। पंद्रह-बीस साल की नौकरी के बाद रिटायर होने वाले भले ही समाज के अनुसार अपने को ढाल लें, परंतु पचपन साल के बाद रिटायर होने वाला फौजी समाज के किसी काम का नहीं और समाज में जीने के नियम कानून न तो उसे मालूम होते हैं, न वह उन्हें अच्छी तरह से अपना ही पाता है। फौज में नौकरी करने की कुछ कीमत तो उसे अदा करनी ही होती है। बहरहाल.....
इन सब आयामों के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो फौजियों का स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण स्वत: स्पष्ट हो जाता है। फौजियों के लिए स्त्री है सिर्फ एक देह, जिसका उपभोग वह करना चाहता है। वह अपनी उम्र के सुनहरे युवा वर्षों में ही यह सीख जाता है कि वह शक्तिशाली है.....देश का रक्षक है......उसके हाथों में देश की अस्मिता है.....वह एक सिपाही है......अत: उसे हर हाल में जीतना ही है.....और जीतने के लिए जरूरी है लड़ना.....पूरी शक्ति से ।.....और लड़ने के लिए सबसे आवश्यक है कि वह शक्तिशाली हो तथा बना रहे.... और जो शक्तिशाली होगा वही तो उपभोग करेगा। कहा ही गया है - वीर भोग्या वसुंधरा। अत: जिसके मन में वसुंधरा भोगने का .....शक्ति अर्जित करने का.....आदर्श रखा जाए.....उद्देश्य रखा जाए..... भला किसी स्त्री के लिए उसके मन में कोई दूसरा विचार कैसे आ सकता है। जब वह वसुधा को भोग सकता है तो स्त्री को क्यों नहीं? जब स्त्री की देह ही उसके लिए सर्वोपरि है तो फिर क्या नारीवाद उसके लिए? यह है क्या बला? किसी फौजी से पूछिये- देखिये क्या उत्तर देता है.....बगलें झांकने लगेगा। शायद वह कह बैठे- 'हम तो पक्के नारीवादी हैं भाई ! हमेशा नारी के बारे में ही सोचते रहते हैं। किसी भी नारी को बुला लो - हम उसे तुरंत खुश कर देंगे। नारी के बिना तो हमारी दुनिया ही मरुस्थल है।' वस्तुत: स्त्री उसके लिए भड़ास निकालने का एक माध्यम है - तन मन की कुँठा को दूर करने का। घर में वह एक शासक, एक हिटलर और तानाशाह होता है। वह अपनी सारी कुँठा, अपनी नौकरी द्वारा किए गए समस्त शोषण का बदला अपनी पत्नी से, बेटी से लेता है। जितनी गालियां उसे नौकरी पर मिलती हैं, उतना बदला वह अपने परिवार से लेता है।
उसके लिए यह एक मरीचिका है कि वह अपनी आत्मा की आवाज़ सुने.....यदि आत्मा बची है.....दिमाग बचा है .....जैसा कहा जाता है कि फौजियों का दिमाग उनके घुटने में खिसक जाता है.....मेरा मानना है कि कभी - कभी यह घुटने से नीचे तलुए तक चला जाता है.....बल्कि अक्सर ही। ब्रेन वाश के बाद उनकी सोचने-समझने की क्षमता ही समाप्त हो जाती है। तब क्या स्त्री और क्या दृष्टिकोण .....मुझे लगता है कि मुझे और कुछ कहने की अवश्यकता नहीं है।
हां! एक आवश्यक बात- यह सब अधिकतर ऐसा है.....पर इसमें अपवाद भी हैं- Exceptions are always there...नहीं तो मैं, एक फौजी, यह सोचता!.....और यदि कदाचित सोचता भी, तो क्या यह सब कह पाता!